Wednesday, January 19, 2022

भक्ति आन्दोलन की पृष्ठभूमि / bhkti aandoln ki prishthbhumi / प्रमुख सम्प्रदाय और भक्ति आन्दोलन / prmukh smprdaay or bhkti aandoln

                     भक्ति आन्दोलन की पृष्ठभूमि / bhkti aandoln ki prishthbhumi  

                           भारतवर्ष में भक्ति की अजस्र परम्परा रही है | भक्ति, भारतीय-संस्कृति के प्राण तत्व के रूप में है | भक्ति की संक्षिप्त व्याख्या ‘महाभारत’ और ‘गीता’ में मिलती है | किन्तु मध्ययुग में भक्ति आन्दोलन का प्रथम सशक्त प्रवाह दक्षिण से उत्तर भारत में आया |

  भक्तिकाल की सम्पूर्ण कालावधि और सामाजिक प्रभाव / bhktikaal ki smpurn kaalavdhi or saamajik prbhav

               भक्तिकाल की सम्पूर्ण कालावधि भारत पर विजातियों के आक्रमण और राजसत्ता का समय है | जो सन 1325 ई से 1628 ई तक है | तुगलक वंश की स्थापना, सैयद वंश, लोदिवंश, गुलाम वंश,और मुगल वंश के समय तक भारतीय समाज में उथल-पुथल होती रही, भारतीय समाज में विजातीयों के आक्रमण, विजेता शासक की दमनकारी नीति, अन्तद्वन्द्वों के दबावों के कारण हिन्दू समाज चिन्हित हुआ | पर इनके समाधान के लिये कोई क्रन्तिकारी कदम उठता नहीं दिखाई पड़ा | हिन्दू जनता अपने ‘स्मृति’ और ‘टीकाओं’ का सहारा लेकर सीमित रहा |

                                       इधर, हिन्दू जातियों – उपजातियों में इतना भेद थे कि परस्पर आत्मीयता का अभाव था, छुआछूत के के नियम सवर्णों में ही नहीं पिछड़ी तथा निचली जातियों में भी कठोर थे | समाज दो वर्णों में बाँटा था – सुविधा सम्पन्न तथा अभाव ग्रस्त |स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थीं, दास प्रथा, सती प्रथा, बहुविवाह और पुनर्विवाह प्रथा, पर्दा प्रथा आदि प्रथाओं ने इनको केवल घर तक सीमित कर दिया था |

                  Vibhinn aachary ke ray men bhkti aandoln /विभिन्न आचार्य के राय में भक्ति आन्दोलन

                      भक्ति के उदय के संबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की सम्मति है – “ अपने पौरुष से हताश जाति के लिये भगवान की भक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था |”

                      डा० रामकुमार वर्मा के अनुसार – हिन्दुओं, में मुसलमानों से लोहा लेने की शक्ति नहीं | वे मुसलमानों को न तो पराजित कर सकते थे और न अपने धर्म की अवहेलना ही कर सकते थे | इस असहायावस्था में उनके पास ईश्वर से प्रार्थना करने के अतिरिक्त अन्य कोई साधन नहीं था |

            डा० गुलाब राय के अनुसार – पराजय की मनोवृति मनुष्य को या तो विषय विलास में लीन करती है या अपनी आध्यात्मिक श्रेष्ठता के प्रदर्शन से क्षतिपूर्ति खोजने की प्रेरणा देती है | अत: भक्तिकाव्य पराजय की क्षति का पूरक भी कहा जा सकता है |

                               डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार – यह बात अत्यंत उपहासास्पद है की जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे, तब उसी समय अपेच्छाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की |मुसलमानों के अत्याचार से यदि भक्ति की भावधारा को उमड़ना था, तो पहले उसे सिंध में और फिर उसे उत्तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर हुई दक्षिण में | द्विवेदी जी पराजित मनोवृति की प्रतिक्रिया के रूप में जातिगत कठोरता और धर्मगत संकीर्णता को ही देखा है |

                                यूरोपीय विद्वानों के अनुसार – भारतवर्ष में भक्ति का उदय ईसाई धर्म की गरिमा का अहंकार है |

 

 

                           प्रमुख सम्प्रदाय और भक्ति आन्दोलन / prmukh smprdaay or bhkti aandoln

1.     अदैतवादी सम्प्रदाय -  इसके प्रवर्तक आदिगुरू शंकराचार्य हैं | अदैत का अर्थ –ब्रह्म और जीव में द्वैत का अभाव अर्थात ब्रह्म और जीव में कोई तात्विक भेद नहीं है | जीव ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है |इन्होंने ज्ञान के अनुभूति पछ पर बल दिया है और कहा है – “अनुभवावसानत्वात ब्रह्म ज्ञानस्य “ इस मत को भक्तिकाल में रामानन्द तथा कबीर ने ईश्वर साधना में ग्रहण किये है |

2.     बिशिष्ट दैतवादी सम्प्रदाय – इस के प्रवर्तक रामानुज है, इनके अनुसार ईश्वर, जीव, और प्रकृति तीन रूप जीवन और प्रकृति में विद्यमान हैं | इनका मूल अंश – ईश्वर अंश जीव अभिनाशी | इस मत को रामानन्द तथा सारे सगुणधारा के कवियों ने माना है | दक्षिण के आलवार में नाथमुनी ने आगे की सम्प्रदाय चलाया, जिनके इष्टदेव लक्ष्मी हैं |

3.     दैतवादी सम्प्रदाय – (1149ई० )- इसके संस्थापक माधवाचार्य हैं | यह मत अदैतवाद के प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ है | इसका मूल अभिव्यक्ति है “तदीय तवम असि “ अर्थात तुझमें और मुझमें भेद है | यह दक्षिण भारत में चला है | द्वैतवाद में भक्ति का साधन अमला भक्ति को माना जाता है |

4.     देता द्वैतवादी सम्प्रदाय – इसके प्रवर्तक निम्बार्काचार्य (12 वी० शताब्दी )है | इसका दार्शनिक आधार ‘द्वैताद्वैतवाद’ अथवा ‘भेदाभेदवाद’ है |इनके ब्रह्म और संस्वर दोनों सत्य है | इन दोनों का सम्बन्ध कार्य – कारण सम्बन्ध है | इस मत का प्रचार वृन्दावन और बंगाल में विशेष रूप से हुआ | निम्बार्क ही प्रथम वैष्णव हैं | जिन्होंने कृष्ण और राधा को सर्वप्रथम विशेष महत्व दिया है |

5.     शुद्धादैतवादी सम्प्रदाय – इस दार्शनिक मत के प्रवर्तक बल्लभाचार्य हुये | इनका मूलमंत्र है – ‘सर्व खलूं इदं ब्रह्मा’ अर्थात सब कुछ ब्रह्म ही हैं |

                               इसके अतिरिक्त रूद्र सम्प्रदाय ( बिष्णु स्वामी ) चैतन्य सम्प्रदाय ( महाप्रभु चैतन्य ) महानुभाव सम्प्रदाय ( चक्रधर ) बारबरी सम्प्रदाय ( आचार्य पुण्डलिक) आदि उल्लेखनीय हैं जिनके प्रयासों से भक्ति आन्दोलन का अन्त: प्रादेशिक स्वरूप निर्मित हुआ |

                                   कालान्तर में “भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानन्द” की कहावत चरितार्थ होती है | दक्षिण भारत में बारह अलवार संत हुए हैं | उन्हें में ‘आदल’ नाम की एक भक्तिन भी हुई है | इन्होंने शंकर के अद्वैतवाद की अवहेलना की थी | भक्ति आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार यही अलवार संत थे | नाथमुनी ने वैष्णव धर्म के प्रचार कार्य में विशेष रूचि ली थी |इसी परम्परा में रामानुजाचार्य हुए, जिन्होंने विशिष्टादैत दर्शन को जन्म दिया था | इसके अनंतर रामनन्द हुए, जिन्होंने मर्यादा पुरुषोतम रामचन्द्र का दिव्य-रूप प्रतिष्टित किया | गोस्वामी तुलसीदास के काव्य के देवता यही मर्यादा पुरुषोतम रामचन्द्र हैं |

                               भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में तीन अन्य आचार्यों का कृत्तित्व भी बिचारनीय हैं| बल्लभाचार्य ने शुद्धादैतवाद, निबार्काचार्य ने द्धैताद्धैतवाद और माधवाचार्य ने द्धैतवाद का सिद्धांत प्रतिष्ठित किया | बल्लभाचार्य ने बालक कृष्ण को इष्टदेव बनाया | दैतवाद में बिष्णु और लक्ष्मी उपास्य हैं | निबार्क सम्प्रदाय में राधा –कृष्ण की भक्ति प्रमुख है | सूरदास ने श्रृंगार की कल्पना राधा बल्लभ – सम्प्रदाय से ली थी और वात्सल्य की कल्पना बल्लभाचार्य से |

                               महाराष्ट्र के भक्त नामदेव ने निराकार ब्रह्म की उपासना का मार्ग हिन्दू और मुसलमान जनता के सम्मुख रखा | इन्हीं की निर्गुण उपासना की परम्परा कबीर, नानक, दादूदयाल आदि संत हुये |

                             सूफी मुसलमानों ने अपनी कविता में हिन्दू-जीवन का स्पर्श बहुत गहराई से किया है | इन्होंने मुख्यत: प्रेम का संदेश दिया | इन कवियों में मलिक मुहम्मद जायसी सर्वश्रेष्ठ हैं |

                           निष्कर्षत: भक्ति की प्रबल भावधारा ने जनमत की निराशा और क्षोम के सम्पूर्ण विकार को धोकर स्वच्छ करने के लिए आगे बढ़ा |  

 

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