साहित्येतिहास लेखन की प्रमुख समस्याएँ
हिन्दी साहित्य इतिहास लिखने के समय निम्नलिखित
प्रमुख सन्दर्भों पर बिचार करना चाहिये –
1.
साहित्य-चेतना के
विकास पर बिचार - साहित्येतिहास लेखन के पहले साहित्य –चेतना के
विकास पर बिचार करना चाहिये | क्योंकि प्रत्येक युग में साहित्य का चेतना निरंतर
परिवर्तन या विकास होता है | जैसे- वर्तमान युग का साहित्य चिन्तन वैसा नहीं है
जैसा कि आचार्य शुक्ल के समय साहित्य की चिन्तन था | यद्यपि साहित्य के प्रतिमान
अधिक नहीं बदले हैं, फिर भी बदलते हुए युग-बोध के कारण प्ररिप्रेक्ष्य,
प्रविधि-प्रक्रिया आदि में परिवर्तन निश्चय होता है | अत; वर्तमान –युग और
पूर्व-युग में समंजस्य तथा इन युगों के अनुरूप प्ररिप्रेक्ष्य – प्रविधि प्रक्रिया
की परिवर्तन पर बिचार करना आवश्यक है |
2.
नवीन – शोध
परिणामों पर बिचार – पिछले –दशकों में निरंतर
अनुसन्धान के फलस्वरूप प्रचुर नवीन सामग्री प्रकाश में आयी है | और अनेक स्वीकृत
तथ्यों का संशोधन हुआ है | जिनसे पूर्ववर्त निर्णय और निष्कर्ष अनिवार्यत: बदल गये
हैं | इन्हें भी बिचार करना है |
इसके
अतिरिक्त और भी सूक्ष्मतर कारण हैं, जैसा कि इलियट ने कहा है – केवल अतीत ही
वर्तमान को प्रभावित नहीं करता , वर्तमान भी अतीत को प्रभावित करता है | इस तर्क
से प्रत्येक युग में साहित्य के नये विकास-रूप उनके पुर्वरुपों के मुल्यांकन को
प्रभावित करते रहते हैं | जैसे- मिश्रबंधुओं के समय श्रेष्ठ कवियों की जो परम्परा थी
उसमें मैथलीशरण गुप्त ,प्रसाद, निराला, पनत आदि के आविभार्व के बाद निश्चय ही हो
गया | हिन्दी महाकाव्य परम्परा में रामचरितमानस और रामचन्द्रिका आदि का स्थान –निर्धारण
करने के लिये प्रियप्रवास, साकेत,और कामायनी की रचना पर बिचार होना चाहिये |
क्योंकि किसी श्रखला मेंजब नई कडिय जुडती हहै तो स्वभावतः पुराणी कड़ियों की स्थिति
पूर्ववत; नहीं रह जाती |
3.
हिन्दी का
स्वरूप-विस्तार पर बिचार – हिन्दी का
स्वरूप पर बिचार कुछ राजनितिक कारणों से उलझ गया है | हिन्दी के भाषा विद्वानों
में कुछ शुरू से ही कहते हैं कि कुछ क्षेत्रों में हिन्दी भाषा प्रदेश है और कुछ
दुसरे भाषी प्रदेश परन्तु कुछ विद्वान् का माना है कि कुछ ही भू-भाग नहीं परन्तु सम्पूर्ण भारत वर्ष के कोने-कोने में बोली जाने
वाली भाषा हो या साहित्यिक सभी हिन्दी भाषा के मूल से ही उत्पति हुई है | अत:इस पर
भी भाषा के रचनाकार को चिन्हित करना चाहिये और साहित्येतिहास लेखन में उचित भाषाई
प्रदेश के श्रेणी में कवि को स्थान निर्धारण होना चाहिये | ऐसा न हो कि उर्दू – भाषा का रचनाकार सीधे तौर से
हिन्दी भाषा के श्रेणी में आये | इन्हें उर्दू में ही उपविभाग बनाकर श्रेणीबद्ध
किये जाने चाहिये |
4.
साहित्य की सीमा
पर बिचार – हमें साहित्य की बिषय पर व्यापक
दृष्टिकोण होना चाहिये | आज साहित्य, ज्ञान, विज्ञानं, ज्योतिष, चिकित्सा, खोगोल
शास्त्र, आदि बिभिन्न विषय पर लिखा जा रहा है, अत: इन्हें एक ही वाड् मय के
साहित्य के अंतर्गत समेटना ठीक नहीं है, विभिन्न उपशाखाओं में बाँटना चाहिए इसी
प्रकार भाषा विज्ञान, पाठ विज्ञान, कोष विज्ञान, पत्रकारिता आदि विभिन्न ज्ञान के
साहित्य है उसी प्रकार दर्शन, इतिहास, राजनीति शास्त्र, भूगोल आदि अनेक क्षेत्रों
के उपलब्धि साहित्य के अंतर्गत ही आते हैं | यहाँ भी साहित्येतिहास लेखन करने वाले
साहित्यकार को बिचार कर काम करनी चाहिये|
5.
आधार स्रोतों पर
बिचार – साहित्येतिहास लेखक को आधार
स्रोतों पर मौलिक बिचार करना चाहिये | क्योंकी वर्तमान में निरंतर अनुसन्धान के
फलस्वरूप अनेक नवीन आधार-स्रोतों का उदघाटन हुए जिससे प्रचुर सामग्री प्रकाश में
आयी है | यहाँ हमें बिचार करना है की अनुसन्धान रिपोर्ट कितनी सत्य सावित हुआ है
इन्हें कितने खोजी-पत्रिका का मान्यता प्राप्त है तथा यह कितना नवीनताएँ हैं |
6.
मौलिकता पर बिचार
– हमें देखना है कि नवीन अनुसन्धान की उपलब्धता इस समय – सिद्ध का कितना महत्व
कारी है | यह एक काल की मान्यता प्रद नहीं हो सकती है |
इसके अतिरिक्त एक
साहित्येतिहास लेखन के समय काल-विभाजन और नामकरण पर उचित बिचार –विमर्श कर ही
केन्द्रित होना चाहिये |
7.
काल-निर्धारण
– हमें इतिहास के काल-निर्धारण में निम्न आधार पर बिचार करना चाहिये – (1)ऐतिहासिक
काल-क्रम के अनुसार – आदिकाल,मध्यकाल,संक्रान्तिकाल, आधुनिककाल आदि |
( 2 ) शासक और उसके शासन काल के अनुसार –
एलिजाबेथ युग, विक्टोरिया युग, मराठा काल आदि |
(1)
लोकनायक और उसके
प्रभाव काल के अनुसार – चैतन्य (बंगला) गाँधी युग (गुजराती) आदि |
(2)
साहित्य नेता एवं
उसके प्रभाव – परिधि के आधार पर – रविन्द्र युग, भारतेंदु युग आदि |
(3)
राष्ट्रीय-
सामाजिक अथवा सांस्कृतिक घटना या आन्दोलन के आधार पर – भक्तिकाल, पुनर्जागरण काल,
सुधार काल, शुक्लोत्तर काल (प्रथम महायुद्ध के बाद का काल-खंड) स्वातन्त्र्योत्तर
काल आदि |
(4)
साहित्यिक प्रवृति
के नाम पर – रोमानी युग, रीतिकाल , छायावाद-युग आदि |
(8.नामकरण-
काल के नामकरण पर बिचार करना चाहिये | जैसे – पहली पद्धति के अनुसार सम्पूर्ण
इतिहास का विभाजन चार युगों अथवा कालखंडों में इस तरह है – 1. आदिकाल, 2.
भक्तिकाल, 3. रीतिकाल, 4. आधुनिक काल | यहाँ, पहला युग का नामकरण शुक्ल के अनुसार
‘वीरगाथाकाल’ पड़ा है | व्ही आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी ने ‘आदिकाल’ रखा है | अन्य
साहित्य इतिहासकारों ने चारणकाल, सिद्ध-सामन्त काल आदि नामों से संज्ञापित कियें
हैं | इसी प्रकार रीतिकाल, आधुनिककाल आदि नामकरण में भी साहित्येतिहासकारों का
अपना-अपना मत है – रीतिकाल को मिश्रबन्धुओं ने ‘अलंकृतकाल’ पं विश्वनाथ प्रसाद
मिश्र ‘श्रगार काल’ आदि नामों से सुशोभित किये हैं | इसी प्रकार ‘आधुनिक काल’ को
‘जागरण काल’ ‘पुनर्जागरण काल’ आदि नामों से नामकरण किये हैं |
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