Thursday, May 19, 2022

सूरदास की भक्तिभावना /surdas ki bhktibhavna

 ·                                      सूरदास की भक्तिभावना 

ans -  सूरदास की भक्ति भावना बल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग से अभिप्रेरित होकर प्रकट हुई है यानि रागानुराग की भक्ति है| कहने का मतलब है जैसे तुलसी की भक्ति में राम भक्ति है पर वैष्णव और शाक्त सम्प्रदाय के बिच समन्वयव की भाव दिखाई परन्तु सूरदास सिर्फ कृष्ण और राधा के प्रति ही भक्ति दिखाई है अर्थात् सिर्फ राधा और कृष्ण के ईश्वर रूप पर ही भक्ति की है | सूरदास अपने ईश्वर को परम अनुग्रह कृपालु माना है| कहता है-

                                  जा पर दीनानाथ ढरै |

                        सुर पतित तरि जाय तनक में जो प्रभु नैक ढरै||

  सूरदास के भक्ति में नारदासक्ति के अनेक भाव प्रदर्शित किये गये हैं जैसे- नारद भक्ति के ग्यारह सूत्र हैं- (गुणमहात्म्यास्क्ति, रूपासक्ति, पुजास्क्ति, स्मरणासक्ति, दास्यासक्ति, सख्यासक्ति, कान्तासक्ति,वात्स्यलासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति, तन्मयासक्ति और विरहासक्ति ) | सूरदास के भक्ति में एन सभी भावों का वर्णन है | विरह भक्ति के लिए भ्रमरगीत गीत प्रसंग उत्कर्ष का शिखर है| सख्य, वात्सल्य, कान्त, तन्मय भावों की भक्ति देखिए –

                                    मेरो मन अनंत कहाँ सुख पावै |

                                    जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवै||

             सूरदास के भक्ति में श्रीमदभागवत के नवधा भक्ति पद पाए जाते हैं | नवधा  भक्ति के निम्न स्वरूप हैं –

                    श्रवण कीर्तनम विष्णो: स्मरण पाद सेवनम |

                     अर्दनम वन्दनम दास्यम, साख्यात्मनिवेदनम ||

        इसने सगुण भक्ति की है|  सूरदास की भक्ति नवधा भक्ति से युक्त सम्प्रदाय विशेष से आश्रित नहीं बल्कि अनुग्रह या कृप्या से युक्त है| भगवान की कृप्या को पाने के लिय पूर्ण तन्मयता के साथ गाए गए पद इसकी भाव पूर्ण भक्ति की सहज उदगार है| जैसे-

        अविगति गति कछु कहल न आवे |

        रूप रेखा गुण जाति बिनु, निरालम्ब कत धावे|

       सब विधि अगम विचारहिं ताते सूर सगुण पद पावे||

                 सूरदास की सगुण भक्ति में वैष्णव भक्ति के के सात निम्नलिखित सोपानों को पार कर भगवान के सामने उपस्थित होता है-

1.  दैन्य – एक सच्चा भक्त भगवान के सामने दीनता और दुर्बलता के साथ निवेदन करता है  और अपने लघुता तथा दुर्बलताओं को स्वयं उत्तरदायित्व मानकर दैन्यता के साथ आराधना करता है –

      अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल |

     काम-क्रोध कको पहिनि चोलना कंठ बिषय की माल|

   ____________________________________

    सूरदास के सारे अविद्या दूर कारे नन्दलाल ||

2.  मान-मर्षता – मान मर्षता का अर्थ अहंकार का विसर्जन है| भक्त जब भगवान के भक्ति से सरोकार होता है तब अपने अहंकार के पूर्व स्थिति को अनुभव करने लगता है| सूरदास की भक्ति में अहंकार का विसर्जन साफ झलगता है|

3.  भय-दर्शन और व्याकुलता – भक्त सांसारिकता के कष्टों को चर्चा करता है और व्याकुलता का प्रर्दशन करता है, ताकि वह सुधर सके| सूरदास में भी यह व्याकुलता देखा जा सकता है –

                         अब के राखि लेहु भगवान|

                          हो अनाथ बैठ्यो दम-दरिया साधे बान|

                          ताके उर मैं भाज्यों चाहत, उपर दुक्यो सचान||

4.  आत्म-भर्त्सना – मान-मर्षता के बाद आत्म-भर्त्सना भक्त के ह्रदय में उत्पन्न होती है| भक्त को जब सांसारिकता के प्रति जब आकर्षण उत्पन्न होती है तब भक्त अपने को धिक्कारता है| इसे आत्म-भर्त्सना कहते हैं, यथा-

                जनम तो ऐसेहिं बीती गयौ,

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               रजनी गत वासर मृगतृष्णा रस हरि कौ न चयो |

               सूर नन्द-नन्दन जेहि बिसरयौ आपुहि आप हयौ ||

5.  आश्वासन – भक्त के मन में जब आत्म-भर्त्सना पूर्ण काष्ठा में पहुँचती है तब हृदय में आश्वासन का भाव आने लगता है | सूरदास के हृदय में भी आश्वासन आयी है, यथा-

          जब-जब दीनन कठिन परी|

     जानत हौं करुनामय स्वामी जय को तब-तब सुगम करी|

6.  मनोराज्य की कल्पना – भक्त के ह्रदय में उपरिलिखित पाँचों सोपान जब सँवार हो जाता है तब मनोराज्य की कल्पना करने लगता है, यथा-

     जाको हरि अंगिवार कियौ |

  ताके कोटि विघ्न हरी करी के, अमे प्रताप दियो |

7.  विचारक – भक्त अब ईश्वर के प्रति इतना समर्पित होता है की जीवन का सारा समय सम्प्रदाय या मतवाद के प्रति आस्था दिखने लगता है और अपने ईश्वर के महिमा की गुण-गान मानव समुदाय के बिच करने लगता है, यथा-

         सुनतहिं जोग लगता एसो सती, ज्यों करुई ककरी |

         सोई व्याधि हमें ली आये देखि सुनी न करी |

        इस प्रकार सूरदास ने आराध्य श्रीकृष्ण को आलम्बन बनाकर भक्ति की सरस धारा प्रभावित किया है जिसमें भक्त ह्रदय की सरल पुकार है जो आत्म समर्पण, आराध्य के प्रति आस्था, लोकोन्मुखी आश्वासन, अहंकार विसर्जन दिखाई पड़ती है |

 

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